चार साहिबजादो की वीरतापूर्वक शहादत की याद में पंजाबी समाज ने निकाली शहीदी मार्च..

# Neeraj Makhija | 24 Dec, 2022

बिलासपुर/- दिसंबर माह का आखिरी सप्ताह भारत वर्ष के इतिहास में श्री गुरु गोविंद सिंह जी के पूरे परिवार की शहादत के लिए जाना जाता है,विशेष तौर पर उनके चार साहिबजादो के लासानी इतिहास के लिए जिन्होंने देश कोम धर्म व सिद्धांतों की रक्षा के लिए वीरता पूर्वक शहादत दी चार साहिबजादो की वीरतपूर्वक शहादत को याद करने के लिए गोडपारा गुरुद्वारा से शहीदी मार्च निकाली गई..

बतादे आपको एक सप्ताह में गुरु गोविंद सिंह साहब के चारों बेटे शहीद हुए थे,वही आज शुक्रवार को सिख समाज ने गुरद्वारा गोंड़पारा से मार्च निकाला साथ ही मार्च में चल रहे बच्चों व बड़ो सभी ने हाथों में पोस्टर थामे हुए थे,जिसमें शांति का संदेश लिखा हुआ था..

कार्यक्रम को सफल बनाने में खालसा युवा सेवा समिति के सदस्य बॉबी छाबड़ा,बंटी लोगनी,तरुण डोरे,सोनू अरोरा,सुमित अरोरा,चीकू दुआ,मुकेश सलूजा,लक्की घई,राजू राजपाल,परमजीत सिंह उपवेजा, डिम्पल उपवेजा,नरेंद्र लूथरा,नरेंद्र गंभीर,रोकी रोबिन सहित खालसा सुखमनी समिति,इस्त्री सत्संग,गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी का सहयोग रहा.।।

 

तो वही गांधी चौक पर इस दौरानराजासाहब न्यूज़ के संपादक व प्रिंट & इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश माखीजा के मार्गदर्शन में उनकी टीम द्वारा शहीदी मार्च को श्रद्धांजलि देते हुए नमन किया गया,इस दौरान मुख्य रूप से अशोक पमनानी,रजत सग्गर,जतिन माखीजा,नीरज माखीजा,शंकर अधिजा,राजा जंकयानी,अंशु बजाज,विक्की सचदेव,शैंकी सलूजा,अमन नागवानी,जय माखीजा सहित ढ़ेरो सदस्य मौजूद रहे..

 

शहीदी सप्ताह की कहानी..

20 दिसम्बर की वो रात गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने परिवार और 400 अन्य सिखों के साथ आनंदपुर साहिब का किला छोड़ दिया था और निकल पड़े उस रात भयंकर सर्दी थी और बारिश हो रही थी,सेना 25 कि.मी.दूर सरसा नदी के किनारे पहुंची ही थी कि मुगलों ने रात के अंधेरे में ही आक्रमण कर दिया, बारिश के कारण नदी में उफान था। कई सिख शहीद हो गए, कुछ नदी में बह गए तो वही इस अफरा तफरी में परिवार बिछड़ गया माता गूजर कौर और दो छोटे साहिबजादे गुरु जी से अलग हो गये तो वही दोनों बड़े साहिबजादे गुरु जी के साथ ही थे..

उस रात गुरू जी ने एक खुले मैदान में शिविर लगाया,अब उनके साथ दोनों बड़े साहिबजादे और 20 सिख योद्धा थे,शाम तक अपने चौधरी रूपचंद और जगत सिंह की कच्ची गढ़ी में मोर्चा सम्भाल लिया,अगले दिन जो युद्ध हुआ उसे इतिहास में 2nd Battle of chamkaur sahib के नाम से जाना जाता है..

ज्ञात हो कि 21 से 29 दिसंबर सिख इतिहास में ही नहीं, देश के इतिहास में बहुत बड़ी शहादत का दिन है,28 दिसम्बर गुरु गोविंद सिंह जी 40 सिख फौजों के साथ चमकौर की गढ़ी एक कच्चे किले में हजारों मुगल सैनिकों से मुकाबला करते हैं एक-एक सिख सैकड़ों मुगलिया सैनिक पर भारी पड़ता है। गुरु गोविंद सिंह जी के बड़े बेटे जिनकी उम्र मात्र 17 वर्ष की थी साहेबजादा अजीत सिंह ने मुगल फौजों में भारी तबाही की, हजारों मुगलों को मौत के घाट उतारा लेकिन बहुत भारी मुगलिया फौज के सामने साहेबजादा अजीत सिंह शहीदी को प्राप्त करते हैं इसके साथ ही छोटे साहिबजादे जिनकी उम्र मात्र 14 वर्ष की है, बड़े भाई की शहादत को देखते हुए पिता गुरु गोविंद सिंह जी से युद्ध के मैदान में जाने की अनुमति मांगी एक पिता ने अपने हाथों से पुत्र को सजाकर युद्ध के मैदान में भेजा, लाखों मुगलों पर भारी साहेबजादा जुझार सिंह ने युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये और लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त हूए..

गुरु गोविन्द सिंह जी के दोनो छोटे बेटे साहिबजादा जोरावर सिंह साहिबजादा फतेह सिंह जिनकी उम्र 5 वर्ष और 7 वर्ष की थी अपनी दादी माता गूजर कौर जी के साथ युद्ध के दौरान पिता गुरु गोविंद सिंह जी से बिछड़ जाते हैं रसोइया "गंगू" की नमकहरामी की वजह से ईनाम के लालच में सरहिंद के नवाब वजीर खान के पास बंदी बना लिये जाते हैं, दोनों छोटे -छोटे मासूम बच्चों को इस्लाम कबूल करवाने के लिए तरह -तरह की तकलीफ़े दी जाती है,माता गूजर कौर और छोटे -छोटे माता जी के पोतों को एक किले के ठंडे बुर्ज में कैद कर रखा जाता है, दिसम्बर का महीना खून जमा देने वाली ठंड उस पर किले का वह वह ठंडा बुर्ज जहां सामान्य दिनों में कपकपा देने वाली ठंड पड़ती है, दादी अपने पोतों को अपनी ममता की छांव में सुलाती है..

27 दिसंबर का वह दिन वजीर खान के दरबार में दोनों छोटे साहिबजादों को हाजिर करने का फरमान जारी होता है,दादी अपने पोतों को सजा कर माथे में कलंगी लगाकर भेजती है,कचहरी में घुसते ही नवाब के समक्ष शीश झुकाना है जो सिपाही साथ जा रहे थे वे पहले सिर झुका कर खिड़की द्वारा अंदर दाखिल हुए,उनके पीछे साहिबजादे थे। उन्होंने पहले खिड़की में पैर आगे किये और फिर सिर निकाला थानेदार ने बच्चों को समझाया कि वे नवाब के दरबार में झुक कर सलाम करे। किन्तु बच्चों ने इसके विपरीत उत्तर दिया और कहा- यह सिर हमने अपने पिता गुरु गोविंद सिंह के हवाले किया हुआ है, इसलिए इसे कहीं और झूकानें का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता..

कचहरी में नवाब वजीर खान के साथ और बड़े-बड़े दरबारी बैठे हुए थे। दरबार में प्रवेश करते ही जोरावर सिंह तथा फतेह सिंह दोनों भाइयों ने गरज कर जयकारा लगाया वाहे गुरु जी का खालसा,वाहे गुरु जी की फतेह..

नवाब तथा दरबारी बच्चों का साहस देखकर आश्चर्य में पड़ गये,मुगलिया फरमान बच्चों को सुनाया गया मुसलमान बनना स्वीकार नहीं करोगे तो कष्ट देकर मार दिये जाओगे और तुम्हारे शरीर के टुकड़े सड़कों पर लटका दिये जाएंगे, ताकि भविष्य में कोई सिक्ख बनने का साहस न कर सके,इस्लाम कबूल करने से तो हमें सिक्खी जान से अधिक प्यारी है। दुनिया का कोई भी लालच वह भय हमें सिक्खी से नहीं गिरा सकता। हम पिता गुरु गोविंद सिंह के शेर बच्चे हैं तथा शेरों की भांति किसी से नहीं डरते। हम इस्लाम धर्म कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। तुमने जो करना हो कर लेना,हमारे दादा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब ने शहीद होना तो स्वीकार कर लिया परन्तु विचलित नहीं हुए..

बच्चों की बातें सुनकर नवाब वजीर खान तिलमिला गया और छोटे -छोटे बच्चों को नींव में चिनवाने का आदेश दिया, दिल्ली के शाही जल्लाद साशल बेग व व बाशल बेग ने जोरावर सिंह व फतेह सिंह को किले की नींव में खड़ा करके उसके आसपास दीवार चिनवाना प्रारंभ कर दी..

बनते-बनते दीवार जब फतेह सिंह के सिर के निकट आ गई तो जोरावर सिंह दुखी ! दिखने लगे। काज़ियों ने सोचा शायद वे घबरा गये हैं और अब धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो जाएंगे। उनसे दुखी होने का कारण पूछा गया। तो जोरावर सिंह बोले मृत्यु भय तो मुझे बिल्कुल नहीं। मैं तो यह सोचकर उदास हूं कि मैं बड़ा हूं,फतेह सिंह छोटा है। दुनिया में मैं पहले आया था। इसलिए यहां से जाने का भी पहला अधिकार मेरा है। फतेह सिंह को धर्म पर बलिदान होने का सुअवसर मुझसे पहले मिल रहा है। छोटे भाई फतेह सिंह ने गुरुवाणी की पंक्ति कहकर दो वर्ष बड़े भाई को सांत्वना दी.

 दोनों छोटे साहिबजादे धर्म की रक्षा के लिए शहीद हो गये। खबर जब माता गुजर कौर जी तक पहूंची तो उन्होंने भी अपने शरीर का त्याग कर दिया चारों साहिबजादो की शहादत के बाद भी गुरु गोविंद सिंह जी विचलित नहीं हुए,इसलिए 21से 29 दिसंबर यह देश के इतिहास में सबसे बड़ा शहीदी दिवस हैं..

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